योगी आदित्यनाथ, (मुख्यमंत्री, उप्र)
सनातन भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति निरंतर आत्मशुद्धि और आत्मपरिष्कार की क्षमता रही है। जब-जब समाज में असमानता, रूढ़ियां और विभाजनकारी प्रवृत्तियां बढ़ीं, तब-तब हमारी संत परंपरा ने समाज को नई दिशा दी। इन संतों ने किसी सत्ता, संप्रदाय या वर्ग के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता के कल्याण के लिए अपना जीवन और अपनी वाणी समर्पित की। संत शिरोमणि रविदास इसी गौरवशाली परंपरा के ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी 650वीं जयंती हमें केवल उनके जीवन का स्मरण करने का अवसर नहीं देती, अपितु उनके विचारों और आदर्शों को अपने जीवन तथा समाज में उतारने की प्रेरणा भी देती है।
संत रविदास ऐसे युग में अवतरित हुए, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार की सामाजिक विषमताओं, रूढ़िगत बंधनों और भेदभावपूर्ण मान्यताओं से जूझ रहा था। उन्होंने अपने जीवन और साधना से यह स्थापित किया कि किसी व्यक्ति का महत्व उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र और साधना से निर्धारित होता है। यही कारण है कि संत रविदास किसी एक समाज, वर्ग अथवा संप्रदाय तक सीमित नहीं रहे। जगद्गुरु रामानंद की शिष्य परंपरा में उनका विशिष्ट स्थान है। वैष्णव समाज उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है, तो सिख पंथ में भी गुरु रविदास को अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ स्वीकार किया गया है। उनकी वाणी ने मत, पंथ और संप्रदाय की सीमाओं का अतिक्रमण कर मानवता को जोड़ने का कार्य किया है। यह उनके व्यक्तित्व की व्यापकता और उनके चिंतन के कालजयी होने का प्रमाण है।
संत रविदास का प्रसिद्ध वचन, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’, भारतीय जीवन-दर्शन का गहन सूत्र है। यह मनुष्य को बाह्य आडंबरों से अधिक अंतःकरण की निर्मलता का महत्व समझाता है। जब मन पवित्र होता है, तब व्यवहार में करुणा आती है, समाज में विश्वास का विस्तार होता है और शासन में न्याय की प्रतिष्ठा होती है। उनके चिंतन का केंद्र मनुष्य के भीतर स्थित उस नैतिक चेतना को जागृत करना था, जो सामाजिक एकता का सूत्रपात करती है।
संत रविदास के दर्शन का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि श्रम केवल आजीविका अर्जित करने का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रनिर्माण का आधार है। उन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय को कभी हीन नहीं माना, उसे ईश्वर की आराधना का माध्यम बनाया। उनके जीवन का यह संदेश आज भी भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण प्रेरणास्रोत है।
संत रविदास का यह प्रसिद्ध पद भारतीय लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा का शाश्वत सूत्र प्रस्तुत करता है:-
‘ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसैं, रविदास रहै प्रसन्न।।’
इस पद में व्यक्त ‘राज’ ऐसे समाज की परिकल्पना है, जहां प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर मिले, किसी के साथ भेदभाव न हो और प्रगति के अवसर सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हों। यही भारतीय सुशासन का आत्मा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाने का राष्ट्रीय संकल्प इसी लोककल्याणकारी दृष्टि का समकालीन स्वरूप है। हमारी सरकार इसी भावना के साथ गरीब, वंचित, दलित, श्रमिक, किसान, महिला, युवा और समाज के प्रत्येक वर्ग को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
संत रविदास के चिंतन का सर्वोच्च विस्तार उनके ‘बेगमपुरा’ के स्वप्न में दिखाई देता है। ‘बेगमपुरा’ केवल किसी आदर्श नगर की कल्पना नहीं, बल्कि ऐसे समाज का स्वप्न है, जहां भय और भेदभाव के लिए कोई स्थान न हो, न्याय सबके लिए समान हो। विकसित भारत का हमारा राष्ट्रीय संकल्प इसी आदर्श को मूर्त रूप देने का प्रयास है। जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, प्रत्येक नागरिक स्वयं को राष्ट्र निर्माण का सहभागी अनुभव करे और सामाजिक समरसता हमारी सबसे बड़ी शक्ति बने, तभी संत रविदास के ‘बेगमपुरा’ की भावना वास्तविक अर्थों में साकार होगी।
संतों की वाणी का वास्तविक सम्मान तभी है, जब उनके विचार समाज के जीवन का हिस्सा बनें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को नई गति मिली है। प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित संत शिरोमणि रविदास की जन्मस्थली, सीर गोवर्धनपुर पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित करते रहे हैं। मुझे भी अनेक अवसरों पर वहां जाकर उनके चरणों में नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। सीर गोवर्धनपुर को केवल एक तीर्थस्थल के रूप में नहीं, अपितु उसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। लगभग 111.81 करोड़ रुपये की लागत से इस पावन परिसर का समग्र विकास हुआ है। संत रविदास के जीवन, दर्शन और सामाजिक योगदान को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से उनकी जन्मस्थली पर अत्याधुनिक संग्रहालय का निर्माण भी कराया जा रहा है।
संत रविदास का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि यदि समाज अपने भीतर भेदभाव और ऊंच-नीच की मानसिकता को बनाए रखे, तो कोई भी व्यवस्था स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकती। इसलिए उन्होंने परिवर्तन की शुरुआत मनुष्य के अंतःकरण से की। उन्होंने आत्मसम्मान को जागृत किया, श्रम को प्रतिष्ठा दी और समाज को समरसता का मार्ग दिखाया।
संत शिरोमणि रविदास की 650वीं जयंती हमें उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ स्वयं को भी उनके आदर्शों के प्रति पुनः समर्पित करने का अवसर प्रदान करती है। आइए, हम ऐसा समाज निर्मित करने का संकल्प लें, जहां समरसता हमारा संस्कार बने, श्रम हमारी गरिमा बने, सामाजिक न्याय प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक विरासत हमारी प्रेरणा बने। यही संत रविदास के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही ‘बेगमपुरा’ की भावना का समकालीन स्वरूप है। इसी पथ पर चलकर हम समरस, आत्मनिर्भर, सांस्कृतिक रूप से जागृत और विकसित भारत के निर्माण के राष्ट्रीय संकल्प को सिद्ध कर सकते हैं।
(साभारः दैनिक जागरण में प्रकाशित आलेख)

